रविवार, 17 मई 2009

गीत

मित्रों ,कभी कभी कुछ भाव हैं जो गीत की शक्ल में ही आते हैं तब मैं न चाहते हुए भी गीत लिख लेती हूँ हालाँकि गीत मेरी विधा नही है .इस गीत की प्रेरणा आदरणीय बुद्धिनाथ मिश्र जी के एक प्रसिद्ध गीत -"एक बार जाल और फेंक रे मछेरे ,जाने किस मछली में बंधन की चाह हो "से मिली और ये गीत बना, वही गीत यहाँ प्रस्तुत है।

चाह नहीं बंधन में बंधने की अब कोई ,
अब तो ये जीवन ही मेरा विस्तार है ।

कुछ बंधन स्वर्णिम हैं ,
कुछ बंधन चमकीले ।
कुछ बंधन फूलों से ,
कुछ लगते हैं ढीले ।

बंधन तो बंधन हैं ,
मुझको इंकार है ।


कुछ बंधन ममता के ,
कुछ हैं दुलार के ।
कुछ बंधन देह के हैं ,
कुछ हैं प्रीत -प्यार के ।

बंधन संबंधों में,
कर रहे दरार हैं ।

कोई कहे बंधन ही ,
जीवन अनुशासन है ।
कोई कहे आजादी ,
सत्य से पलायन है ।

औरों के मत -अभिमत ,
कब मुझे स्वीकार हैं ?

सब बंधन टूटेंगे ,
जाना है एक दिन ।
सब पीछे छूटेंगे ,
जाना है एक दिन ।

फ़िर इतना क्यूँ बांधे,
नश्वर संसार है ।

चाह नही बंधन में बंधने की अब कोई ,
अब तो ये जीवन ही मेरा विस्तार है .

शुक्रवार, 15 मई 2009

टुकडा -टुकडा जिंदगी

चलो ,इस टुकडा -टुकडा ज़िन्दगी को जोड़ कर ,
एक चादर सी लें
एक चादर ,
जो कभी तेरा लिबास बन जाए
कभी मेरा लिबास बन जाए
और जब वक्त की धूप
हमारे सर पर आए ,
तो ये चादर हम दोनों का सरमाया बन जाए

चलो ,इस टुकडा -टुकडा ज़िन्दगी को जोड़ कर ,
एक चादर सी लें
एक चादर ,जिसे ओढ़ कर हम
अपनी सपनों की दुनिया में खो जायें
जहाँ .......
एक शांत बहती नदी हो
जहाँ ...........
पुराने मन्दिर हों
जहाँ चाँद -तारों भरा आकाश हो
और जब मैं नींद से जागूँ ,
तो तू मेरे पास हो

मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

रिश्ते

लोग ......
जो हर रिश्ते का एक नाम चाहते हैं ,
नहीं जानते ........कि कुछ रिश्ते ,
बिना नामों के
सदियों से
चलते रहे हैं ,पलते रहे हैं
ये रिश्ते हो सकते हैं किसी के भी बीच
जैसे ...
मनुष्य और मनुष्य के बीच
मनुष्य और पृकृति के बीच
मनुष्य और जानवर के बीच
मतलब ये
के किसी भी तरह के हो सकते हैं ये अनाम रिश्ते

आप ही बताइए ...?
कि लोग ....
जो हर रिश्ते का एक नाम चाहते हैं
क्या नाम देंगे ....?
कोयल और अमराई के रिश्ते को
क्या नाम देंगे ...?
उमंग और तरुणाई के रिश्ते को
क्या नाम देंगे ....?
बसंत और फूलों के रिश्ते को
क्या नाम देंगे ...?
सावन और झूलों के रिश्ते को
लोग .......
जो हर रिश्ते का एक नाम चाहते हैं

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

मित्रों ,क्षमा प्रार्थी हूँ बहुत दिनों से आप लोगों से सम्पर्क नही हो पाया .कुछ काम की अधिकता और कुछ यात्रा -प्रवास के कारण .सो अब अपनी इस गलती को सुधारते हुए एक कविता पोस्ट कर रही हूँ कृपया अपने बहुमूल्य सुझाव अवश्य दें।
मेरे लिए

आगे -आगे और दूर तक ,
मुझको चलना था एकाकी
इस यथार्थ की पगडण्डी पर ,
जो कंकरीली है ,पथरीली है, काँटों वाली
तुमने नाहक बिछा दिए हैं ,
सुगम राजपथ मेरे आगे
स्वपनलोक के

युगों -युगों तक और रात- दिन
मुझको जलना था एकाकी ,
बिना स्नेह के, बिना दीप के ,
अग्निशिखा बन
तुमने नाहक स्नेह भर दिया
इस दीपक में

उबड़ -खाबड़ जीवन पथ पर
मुझको चलना था एकाकी ,
अंधकार में, बिना सहारे
तुमने नाहक गिरते -गिरते बचा लिया है
थाम लिए मेरे कर अपने कर में

मंगलवार, 24 मार्च 2009

क्या लिखूं

नीला आकाश लिखूं ,
पीपल का गाछ लिखूं
या लिखूं कि
महके हैं आमों पर बौर

दहकता पलाश लिखूं ,
फागुन की बात लिखूं
या लिखूं
रंग भरे सपने कुछ और

सरसों की लाज लिखूं
बरसों की याद लिखूं
या लिखूं कि,
भीगी है आँखों की कोर

पिछले अनुबंध लिखूं ,
बासंती छंद लिखूं
या लिखूं ...
तुम्हारा नाम ......
एक बार और .

सोमवार, 16 मार्च 2009

ब्लॉग मित्रों ,
आप लोगों की उत्साहवर्धक टिप्पणियों के प्रताप से मुझमें भी आपनी नई-पुरानी रचनाओं को पोस्ट किए चले जाने का चस्का लग गया है सो आपलोग अब अपनी करनी का फल प्राप्त करो..... और एक रचना झेलो -

मैं

गर्म ,तपती हुई रेत पर ,
पानी की एक बूँद,
मैं ,
गिरी तो क्षण भर में ,
समाप्त हो गई ।
समाप्त हो गया मेरा अस्तित्व ।

कौन जाने
क्यों ...?
कहाँ ...?
कब ...?
कैसे ...?
गिरी वह बूँद ,
और फ़िर मरुभूमि में गिरकर ,
क्या बनी...?
मैं भी नहीं जानती मेरा क्या होगा ।
बदल बन के बरसने की सामर्थ्य नहीं मुझमें ।
शायद कहीं ....
फूलों पर शबनम की बूँद बनकर ,
या फ़िर
दूब की नोक पर तुहिन कण सी ,
चमकुंगी केवल सुबह -सवेरे ।

लेकिन .......
कौन जानेगा मुझे ...?
पहचानेगा मुझे ...?
कि
मैं वही मरू भूमि में गिर पड़ी एक बूँद हूँ ।

किंतु तुम पहचान लेना ।
हर एक बूँद ,जो ओस है या आंसू है ,
मेरा ही सर्वांश है ,यह जान लेना ।

और फ़िर तुम देखना ,
कैसे झरते -झरते हंसूंगी मैं ,
और हंसते -हंसते झरूँगी मैं .

शनिवार, 14 मार्च 2009

मौसम

यहाँ बेवक्त ,बेमौसम
बदल छा गए हैं ।
सब कुछ ढंका -ढंका सा है ,
मन भी ।

हालाँकि शहर के बीचों बीच
अब भी कई पलाश हैं जो दहक रहे हैं ,
वैसे मौसम तो दहकते पलाशों का ही है
तुम्हारे शहर का मौसम कैसा है ...?

ढंके ढंके से इस मौसम में
एक आंच से ,
कुछ अनदेखे ,अनजाने
अनबुने और शायद अनचाहे भी
खदबदा रहे हैं सपने

वैसे ये सपनों का मौसम तो नहीं ।
तुम्हारे यहाँ मौसम कैसा है ...?
मन का .