शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

मित्रों ,क्षमा प्रार्थी हूँ बहुत दिनों से आप लोगों से सम्पर्क नही हो पाया .कुछ काम की अधिकता और कुछ यात्रा -प्रवास के कारण .सो अब अपनी इस गलती को सुधारते हुए एक कविता पोस्ट कर रही हूँ कृपया अपने बहुमूल्य सुझाव अवश्य दें।
मेरे लिए

आगे -आगे और दूर तक ,
मुझको चलना था एकाकी
इस यथार्थ की पगडण्डी पर ,
जो कंकरीली है ,पथरीली है, काँटों वाली
तुमने नाहक बिछा दिए हैं ,
सुगम राजपथ मेरे आगे
स्वपनलोक के

युगों -युगों तक और रात- दिन
मुझको जलना था एकाकी ,
बिना स्नेह के, बिना दीप के ,
अग्निशिखा बन
तुमने नाहक स्नेह भर दिया
इस दीपक में

उबड़ -खाबड़ जीवन पथ पर
मुझको चलना था एकाकी ,
अंधकार में, बिना सहारे
तुमने नाहक गिरते -गिरते बचा लिया है
थाम लिए मेरे कर अपने कर में

8 टिप्‍पणियां:

  1. युगों -युगों तक और रात- दिन
    मुझको जलना था एकाकी ,
    बिना स्नेह के, बिना दीप के ,
    अग्निशिखा बन
    तुमने नाहक स्नेह भर दिया
    इस दीपक में ।

    बहुत ही सुन्दर रचना . आभार.

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  2. बहुत खूब। कहते हैं कि-

    सारे चराग हमने लहू से जलाये हैं।
    जुगनू पड़ के घर में उजाला नहीं किया।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  3. aapki kalam main pravah hai. bhavnapn ka shabdon ka. baar baar padane ka man karta hai. aapki kalam ki yah ravani hamesha barkarar rahe. aameen.
    mere blog (meridayari.blogspot.com)par bhi aayen

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  4. क्या बात है..बहुत उम्दा!!

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  5. युगों -युगों तक और रात- दिन
    मुझको जलना था एकाकी ,
    बिना स्नेह के, बिना दीप के ,
    अग्निशिखा बन
    तुमने नाहक स्नेह भर दिया
    इस दीपक में ।

    खूबसूरत. अच्छी रचना.

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  6. सीमा जी ;

    बहुत ही अच्छी कविता , यथार्थ के करीब और अपने मन के भावो को सही अभिव्यक्ति दी है आपने ..

    " थाम लिए मेरे कर अपने कर में " क्या खूब लिखा है जी ! शब्द जी उठे है आपकी नज़्म में !

    आपने बहुत अच्छा लिखा है जी ! .. सच जीवन के surprises बहुत अनोखे होते है ! ..

    इतनी अच्छी कविता के लिए दिल से बधाई स्वीकार करियेगा .


    विजय
    http://poemsofvijay.blogspot.com

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  7. क्या कहें बस
    अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ ......

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  8. एकाकी चलने की चाह ............और सुन्दर एहसास की अनुभूति ..........अनचाहे जागती चाह की सुन्दर अभिव्यक्ति

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