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बुधवार, 29 दिसम्बर 2010


शुभ कामनाएं


लिखती हूँ तुम्हारा नाम
कई बार ............
गहरे नीले आकाश पर चमकते तारों से ,
बेतरतीब खिले हुए फूलों से ,
रेत से
और लहरों से भी .
कभी -कभी
अलसुबह पत्तियों पर पड़ी ओस से भी ,
लिखती हूँ तुम्हारा नाम
फिर -फिर .....
अनखुले गुलाबों की पंखुड़ियों पर ,
कुछ देर में उड़ जाने वाली चिड़िया के पंखों पर ,
अभी अभी उग आये सूरज की नर्म हथेलियों पर,
यहाँ तक की छुईमुई की बंद होती हुई पत्तियों पर भी
लिखती हूँ तुम्हारा नाम
कि

जब लहरें किनारों को छुएंगी,
ओस झर जाएगी पत्तों से .
गुलाब खिल जायेंगे ,
सूरज चमकने लगेगा .
चिड़िया उड़ जाएगी दूर.....
और खुल जाएँगी छुईमुई की पत्तियां
तब
शुभकामनाये पहुँच जाएँगी मेरी
तुम तक
जिनमें लिखा है मैंने
तुम्हारा नाम .

मंगलवार, 15 जून 2010


गुलमोहर के रंग फीके हैं यहाँ पर ,
तुम नहीं हो .
धूप के भी तीर तीखे हैं यहाँ पर ,

तुम नहीं हो .

तुम नहीं हो, और ये लम्बी दोपहरी
आँख की कोरों पे आके बूँद ठहरी .
कब गिरेगी, ना गिरेगी कौन जाने ?
कौन उंगली पर सम्हाले ....?

तुम नहीं हो .
गुलमोहर के रंग फीके हैं यहाँ पर ,
तुम नहीं हो .

तुम नहीं हो .......शाम थक जाती है अक्सर
फिर धधकती सेज पर सोती है थककर
सोचती हूँ रात गहरी है ? ..... के मेरी पीर गहरी ?
कौन सीने से लगा ले .........?

तुम नहीं हो .
धूप के भी तीर तीखे हैं यहाँ पर ,
तुम नहीं हो .
तुम नहीं हो भोर का पहला पहर है
कहीं सोया, कहीं जागा सा शहर है
एक लम्बी सी सड़क पर चल रही हूँ मैं अकेली .
कौन मेरा हाथ थामे .....?

तुम नहीं हो .
तुम नहीं हो ,प्रणय पथ का ये अनोखा ही सफ़र है
मैं यहाँ और दूर कितना हमसफ़र है
दूर रहकर साथ चलना ,साथ रहकर दूर होना .
कौन समझेगा ये रोना ...?

तुम नहीं हो

बुधवार, 20 जनवरी 2010

लो बसंत आ गया


मित्रों , एक पूरा साल आप लोगों की दोस्ती में कब बीता पता ही नहीं चला और फिर से बसंत का मौसम आगया .हमारे शहर में कड़ाके की ठण्ड के बीच भी अनंग सखा बसंत ने अपनी आमद दर्ज करा ही दी है ,जिसका प्रमाण बौरों से भरे हुए आम के वृक्षों ने दे दिया है .आज बसंत पंचमी है ,ऋतुराज बसंत के आने का संकेत .शीत से ठिठुरती हुई प्रकृति में नव प्राणों का संचार होने लगा है .वृक्षों ने पत्ते बदलना प्रारंभ कर दिया है ताकि नए रंगीन पत्तों और फूलों के साथ बसंत का स्वागत कर सकें .जब प्रकृति नई ऋतू के स्वागत में प्रसन्न है तो भला हम क्यों पीछे रहे ...?आप सब भी नए उत्साह से ,नई आशाओं के साथ बसंत का स्वागत करें इन्ही शुभेच्छाओं के साथ आप सब को ------ बसंत पंचमी की भीनी भीनी सुगंध भरी शुभकामनायें

बृहस्पतिवार, 31 दिसम्बर 2009

आने दो खुशियों से भरे नए साल को

सभी दोस्तों ,आदरणीयों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें
मित्रों,
जीवन आशाओं ,उमंगों और नवीनताओं से भरा हुआ एक रहस्य है जिसे केवल और केवल जीकर ही जाना जा सकता है .प्रतिदिन नया दिन होता है जिसमें बीते हुए कल से अलग कुछ होता है, इसलिए आप सभी को नववर्ष की इस नयी सुबह साल भर के हर दिन के लिए शुभकामनाएं कि आप सभी स्वस्थ रहें ,खुश रहें ,खुशियाँ बांटें और देखें की आपकी खुशियाँ चौगुनी होकर आपको मिलेंगी इन्ही शुभ कामनाओं के साथ नए साल के स्वागत में कुछ पंक्तियाँ -----


मन से निकल दो सब मैल को, मलाल को
आने दो खुशियों से भरे नए साल को

बीती सो बात गई ,
अंधियारी रात गई .
नव प्रभात आया है ,
लेकर सौगात नई

फैलने दो मन आँगन, प्यार के गुलाल को
आने दो खुशियों से भरे नए साल को

लेकर संकल्प नए ,
तलाशें विकल्प नए
दिन बीते ,युग बीते ,
फिर आये कल्प नये

क्या होगा ?कब होगा ?छोडो इस सवाल को
आने दो खुशियों से भरे नए साल को

खुशियाँ दें, गम ले लें
सुख- दुःख मिलकर झेलें
जीवन के खेल को ,
हँस -हँस कर हम खेलें

साथ आयें ,सुलझाएं जीवन जंजाल को
आने दो खुशियों से भरे नए साल को

सीमा

बृहस्पतिवार, 17 सितम्बर 2009

मन की खिड़की

प्रिय मित्रों ,

बीमार होने की वजह से पिछले कुछ महीनों से आप लोगो से मिलना नही हो पाया ,बहुत बहुत क्षमा प्रार्थी हूँ .बीमारी तो खैर दिल की है जिसके ठीक होने के आसार नहीं हैं बस दवाओं और दुआओं के साथ ही जीना है ।
अपनी एकदम ताज़ा रचना आप सबके लिए प्रस्तुत है .कृपया मेरी अनुपस्तिथि को क्षमा करते हुए अपने कमेंट्स जरुर दीजियेगा ।

मन की खिड़की


मैं
अक्सर खुली छोड़ देती हूँ,
मन की खिड़की
कि
कहीं किसी गृहणी के बालों में बंधे गजरे से
मोगरे कि खुशबू
मुझे ढूँढती हुई जाए ,
मेरी सांसों में समां जाए
तो
मेरा मन महकने लगे शायद !

मैं
अक्सर खुली छोड़ देती हूँ ,
मन कि खिड़की
कि
कहीं किसी कडकडाती ठण्ड की सुबह ,
कोई धूप का नन्हा सा छौना ,
कूद कर अन्दर आजाये
और मेरे ठिठुरते हुए पैरों को
हौले से छू ले ,
तो ठंडे हो चुके रिश्तों में ,
गर्माहट भर जाए शायद !

मैं
अक्सर खुली छोड़ देती हूँ
मन की खिड़की
कि
कहीं कोई घोंसला बनने कि फिराक में फिरती गोरैय्या
फुदक कर अन्दर जाए
किसी कोने में छुप कर,
अपना आशियाना सजाये ,
और कुछ नन्हीं -नन्हीं आवाजों से ,
घर भर जाए
तो
मेरे भीतर का सन्नाटा टूटे शायद !

मैं
अक्सर खुली छोड़ देती हूँ
मन की खिड़की
कि
कभी कोई शरद पूर्णिमा का चाँद
मेरे मन में जाए ,
और कोई कृष्ण उस चांदनी में ,
अलौकिक सुरों में बांसुरी बजाये ,
कोई राधा पैरों में पायल पहने ,
सोलह श्रृंगार किए रास रचाए
तो
सूना मधुबन गुंजार हो जाए शायद !

मैं
अक्सर खुली छोड़ देती हूँ
मन की खिड़की
कि
हवा आए
धूप आए
बारिश आए
चाँदनी आए
रंग आए
सुगंध आए
मौसम आयें
त्यौहार आयें
खुशियाँ आयें
फूल आयें
चिडियां आयें
बच्चे आयें
दोस्त आयें
प्यार आए
-
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-
-
और तू आए शायद!

शनिवार, 27 जून 2009

आउंगी ज़रूर मैं

आउंगी जरुर मैं

आउंगी जरुर मैं ,
पर
प्रतीक्षा मत करना मेरी

किसी भी दिन अचानक
आकर खड़ी हो जाउंगी ,
तुम्हारे सर्वथा निजी एकांत में
सोख लूंगी तुम्हारे भीतर की निस्तब्धता ,
अपनी उन्मुक्त हँसी से
मुस्कुराये बिना नहीं रह सकोगे तुम


आउंगी जरुर मैं
पर ,
प्रतीक्षा मत करना मेरी

किसी भी दिन अचानक
झाँकने लगूंगी ,मुडे -तुडे पन्नों से
कविता की पुरानी पुस्तक के .
खोल दूंगी यादों की खिड़कियाँ
कविता की पंक्तियों से
पढ़े बिना नही रह सकोगे तुम

आउंगी जरुर मैं
पर
प्रतीक्षा मत करना म्रेरी

किसी भी दिन अचानक
गूंजने लगूंगी तुम्हारे हृदय में ,
वंशी की मधुर तान सी
घोल दूंगी रस
तुम्हारे प्राणों में ,मन में
गुनगुनाये बिना नहीं रह सकोगे तुम

आउंगी जरुर मैं
पर
प्रतीक्षा मत करना मेरी

हो सके तो
बस
खुले रखना द्वार
हृदय के
कि
मैं आकर खड़ी हो सकूँ

हो सके तो
बस
सम्हाल कर रखना
कविता की पुरानी पुस्तक
कि
झांक सकूँ उ़सके पन्नों से

हो सके तो
बस
सहेज कर रखना
मन की बांसुरी
कि
मैं छेड़ सकूँ कोई धुन

आउंगी जरुर मैं
पर
प्रतीक्षा मत करना मेरी

शनिवार, 13 जून 2009

बदल बन जायें


आओ हम बादल बन जायें
प्रेम की रिमझिम फुहारों से ,
धो डालें उस धूल को ,
जो
वृक्षों के पत्तों पर ,फूलों पर ,डालों पर जम गई है
और जमी है ,हम सब के अन्तर में , कटुता बन कर
आओ हम बादल बन जायें

आओ हम बादल बन जायें
ताकि भुला सकें हम आपस का वैमनस्य ,
जो
बांटता है हमको ,
धर्मों में ,वर्णों में ,
जाती
में ,वर्गों में
और
बाँट देता है , आदमी को आदमी से

आओ
हम बादल बन जायें

आओ
हम बादल बन जायें
क्योंकि बादल तो बस उमड़ घुमड़ कर बरसना जानता है
वह नही जानता के उसके बरसने से
राजा भीगेगा या फ़कीर
बादल
का तो बस एक ही धर्म
उमडना ,घुमडना ,बरसना ...... और बरसना

तो आओ हम बादल बन जायें .