आउंगी जरुर मैं
आउंगी जरुर मैं ,
पर
प्रतीक्षा मत करना मेरी ।
किसी भी दिन अचानक
आकर खड़ी हो जाउंगी ,
तुम्हारे सर्वथा निजी एकांत में ।
सोख लूंगी तुम्हारे भीतर की निस्तब्धता ,
अपनी उन्मुक्त हँसी से ।
मुस्कुराये बिना नहीं रह सकोगे तुम ।
आउंगी जरुर मैं
पर ,
प्रतीक्षा मत करना मेरी ।
किसी भी दिन अचानक
झाँकने लगूंगी ,मुडे -तुडे पन्नों से
कविता की पुरानी पुस्तक के .
खोल दूंगी यादों की खिड़कियाँ ।
कविता की पंक्तियों से
पढ़े बिना नही रह सकोगे तुम
आउंगी जरुर मैं
पर
प्रतीक्षा मत करना म्रेरी
किसी भी दिन अचानक
गूंजने लगूंगी तुम्हारे हृदय में ,
वंशी की मधुर तान सी ।
घोल दूंगी रस
तुम्हारे प्राणों में ,मन में ।
गुनगुनाये बिना नहीं रह सकोगे तुम ।
आउंगी जरुर मैं
पर
प्रतीक्षा मत करना मेरी ।
हो सके तो
बस
खुले रखना द्वार
हृदय के ।
कि
मैं आकर खड़ी हो सकूँ ।
हो सके तो
बस
सम्हाल कर रखना
कविता की पुरानी पुस्तक
कि
झांक सकूँ उ़सके पन्नों से ।
हो सके तो
बस
सहेज कर रखना
मन की बांसुरी ।
कि
मैं छेड़ सकूँ कोई धुन ।
आउंगी जरुर मैं
पर
प्रतीक्षा मत करना मेरी
शनिवार, 27 जून 2009
शनिवार, 13 जून 2009
बदल बन जायें

आओ हम बादल बन जायें ।
प्रेम की रिमझिम फुहारों से ,
धो डालें उस धूल को ,
जो वृक्षों के पत्तों पर ,फूलों पर ,डालों पर जम गई है ।
और जमी है ,हम सब के अन्तर में , कटुता बन कर ।
आओ हम बादल बन जायें
आओ हम बादल बन जायें ।
ताकि भुला सकें हम आपस का वैमनस्य ,
जो बांटता है हमको ,
धर्मों में ,वर्णों में ,
जाती में ,वर्गों में ।
और बाँट देता है , आदमी को आदमी से ।
आओ हम बादल बन जायें
आओ हम बादल बन जायें
क्योंकि बादल तो बस उमड़ घुमड़ कर बरसना जानता है ।
वह नही जानता के उसके बरसने से
राजा भीगेगा या फ़कीर ।
बादल का तो बस एक ही धर्म
उमडना ,घुमडना ,बरसना ...... और बरसना ।
तो आओ हम बादल बन जायें .
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