शनिवार, 13 जून 2009

बदल बन जायें


आओ हम बादल बन जायें
प्रेम की रिमझिम फुहारों से ,
धो डालें उस धूल को ,
जो
वृक्षों के पत्तों पर ,फूलों पर ,डालों पर जम गई है
और जमी है ,हम सब के अन्तर में , कटुता बन कर
आओ हम बादल बन जायें

आओ हम बादल बन जायें
ताकि भुला सकें हम आपस का वैमनस्य ,
जो
बांटता है हमको ,
धर्मों में ,वर्णों में ,
जाती
में ,वर्गों में
और
बाँट देता है , आदमी को आदमी से

आओ
हम बादल बन जायें

आओ
हम बादल बन जायें
क्योंकि बादल तो बस उमड़ घुमड़ कर बरसना जानता है
वह नही जानता के उसके बरसने से
राजा भीगेगा या फ़कीर
बादल
का तो बस एक ही धर्म
उमडना ,घुमडना ,बरसना ...... और बरसना

तो आओ हम बादल बन जायें .

9 टिप्‍पणियां:

  1. आओ हम बादल बन जायें ।
    प्रेम की रिमझिम फुहारों से ,
    धो डालें उस धूल को ,
    जो वृक्षों के पत्तों पर ,फूलों पर ,डालों पर जम गई है ।
    और जमी है ,हम सब के अन्तर में , कटुता बन कर ।
    आओ हम बादल बन जायें........


    par kya waaqai mein wo dhool dhul jayegi.....????????

    pata nahin........


    par shayad .......haan!!!!!!!!


    par baadal banna bhi bahut mushkil hai aur shayad hota bhi hai.......


    apki kavita mann ko chhoo gayi.......


    Regards......


    (Plz do also follow my blog)

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  2. बहुत ही सुन्दर रचना ................बादलो का मौसम भी कुछ ऐसा ही एहसास कराते है.......बढिया

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  3. बादल का तो बस एक ही धर्म
    उमडना ,घुमडना ,बरसना ...... और बरसना ।
    तो आओ हम बादल बन जायें .
    क्या गहन भाव हैं ,बधाई .

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  4. bahut achchhi rachana. badal banane ka karan bhi bahut shandar hai.
    badhai

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  5. धन्यवाद,बहुत सुंदर रचना,

    काश कही हम बादल होते,
    दूर कही अपने रंगत मे,
    स्वच्छ घने निर्मल अंबर में,
    काले गोरे की संगत मे.


    जात पात को ,छोड़ छाड़ कर,
    धर्म कर्म को छोड़ छाड़ कर,
    मस्त हवा मे उड़ते जाते,
    घुल मिल कर उल्लास जगाते.


    नही ये कहते हम उँचे है,
    नही नीच का दुखड़ा रोते
    मिटा के खाई निज-गैरों का
    अपनेपन का प्रेम पिरोते.


    काश अगर हम होते बादल ,
    सब कुछ अलग अलग सा दिखता,
    नही दिखावा हम फिर करते,
    प्यार नही बाजार मे बिकता.


    आओ करते यही दुआ हम,
    प्यार भरा ये ख्वाब पिरोते ,
    सपने मे एक बार सही हो,
    हम सब सारे बदल होते,

    हम सब सारे बदल होते.

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  6. तो आओ हम बादल बन जायें ।
    इस पंक्ति से कविता का अंत प्रभावी बन पड़ा है । सब कुछ जो ऊपर कहा गया है, उसका दृढ़ संकल्प दिखता है इन अंतिम पंक्तियों में ।
    आभार ।

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  7. seema ji ,

    mausam ke ahsaas ko aapse behar koi nai ji sakta hai ..aapne varsha riutu ka swaagt jis apnepan se kiya hai aur jis tarah se khoobsurat shabdo se is swagat ka shringaar kiya hai ...wo anupam hai....

    meri badhai dil se sweekar karen...

    aabhaar aur dhanyawad
    aapka
    vijay

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  8. वह नही जानता के उसके बरसने से
    राजा भीगेगा या फ़कीर ।
    बादल का तो बस एक ही धर्म
    उमडना ,घुमडना ,बरसना ...... और बरसना

    सुन्दर लिखा है...........bhaav भी barsaat की तरह umad ghumad कर chaa गए हैं इस rachna में ............ mousam के साथ barasta rachna

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