शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

प्यार

प्यार
मैंने तुम्हें कभी नही किया अस्वीकार
जब तुमने पुकारा
मैंने खोल दिए द्वार
कभी प्रतीक्षा में तुम्हारी
सजाई रंगोली ,
बांधे बन्दनवार
प्यार
मैंने तुम्हें कभी नही किया अस्वीकार

कभी सूनेपन में तुम्हें
गीत बनाकर गा लिया
कभी अकेलेपन में ,
मीत बना ह्रदय से लगा लिया

प्यार ....
मैंने तुम्हे कभी नहीं किया अस्वीकार

किंतु ...मेरा द्वार सुना ही रहा
किंतु ,मेरा गीत अधूरा ही रहा
और रहा भुजपाश भी खाली मेरा

दूर -दूर तक कोई नहीं था
बस....अँधेरा

प्यार ...
सच बतलाओ
क्या तुम इश्वर की तरह होने और होने के बीच हो ?
सच बतलाओ ....
क्या तुम इतने विराट हो ?
कि मेरे द्वार से नही सकते
या मेरे भुज पाश में समां नहीं सकते
या फ़िर हो इतने छुद्र ,
इतने झूठे ,इतने अस्तित्वहीन
कि मुझे अपने होने का विश्वास भी नहीं दिला सकते

8 टिप्‍पणियां:

  1. Kya kahun.....shabdhin kar diya aapne...bahut hi sundar bhavabhivyakti.sundar rachna.

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  2. अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं।बधाई।

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  3. अनजाने, अनबूझे प्यार को कल्पना का रूप दे कर सुन्दर अल्फाज़ में बाँध कर शशक्त रचना लिखी है आपने.....बहुत बहुत बधाई

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  4. पहली बार आए है आपके ब्लोग पर और आकर अच्छा लगा। आपने सुंदर लिखा है। साथ ही आपके प्रोफ़ाईल पर नजर गई तो वो भी गजब का लगा।

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  5. aapki pichhli rachnaye bhi padhi, gambheer, hraday sparshi, aur shabd nahi hai mere paas,aapki rachnao ki tareef k liye.

    ------------------------------------"VISHAL"

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  6. रंजना जी ,परमजीत जी संगीता जी ,दिगंबर जी शुशील जी और विशाल जी आप सब का बहुत शुक्रिया .कृपया यदि कहानियो में रूचि रखते हों तो मेरे ब्लॉग काहेनैनालागे पर अवश्य आयें.

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  7. seema

    is poem ko yadi main aapki sabse acchi poem kahun to atishyokti nahi hongi ..
    bahut sundar shbdon se saji hui rachana
    badhaiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii.

    main bhi kuch likha hai , jarur padhiyenga pls : www.poemsofvijay.blogspot.com

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