बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

geet


पास आओ तुम जरा
मैं ज़िन्दगी से प्यार कर लूँ ।
तुमसे अपने सुख दुखों की ,
बातें भी दो चार कर लूँ ।

हर कदम और हर डगर पर ,
जीत मेरी ही रही है ।
प्रशंसा के पुष्प पाए ,
चोट मैंने कब सही है ?
किंतु तुमसे मिल के जाना,
हर में भी सुख कहीं है ।

इस निरर्थक जीत को मैं ,
आज अपनी हार कर लूँ ।

                                            पास आओ तुम जरा .............

नेह -नाते ,मोह -ममता ,
बंधन समझ कर तोड़ डाले ।
मैं ही मैं बस मैं ही मैं हूँ ,
मुझको न कोई लाँघ डाले
मैं शिखर पर बैठ कर भी ,
हो गया कितना अकेला ।
चाहता हूँ कोई अपनी गोद में ,
मुझको छुपा ले ।

आज सब रूठे हुओं से ,
चलो मैं मनुहार कर लूँ ।

                                        पास आओ तुम जरा ...........
इस उतरती धूप में अब
हो रहा विश्वास मुझको ,
स्वार्थ के बंधन जकड कर
दे रहे संत्रास मुझको ।
मैं हमेशा झूट का सर्जक रहा हूँ ,
सत्य लेकिन सत्य है ,यह
हो चला विश्वास मुझको ।
प्रेम की इस अग्नि मैं अब ,
पाप का परिहार कर लूँ ।

पास आओ तुम जरा मैं
ज़िन्दगी से प्यार कर लूँ .

2 टिप्‍पणियां:

  1. seema , this is again very impressive work of words..

    पास आओ तुम जरा ...........
    इस उतरती धूप में अब
    हो रहा विश्वास मुझको ,
    स्वार्थ के बंधन जकड कर
    दे रहे संत्रास मुझको ।
    मैं हमेशा झूट का सर्जक रहा हूँ ,
    सत्य लेकिन सत्य है ,यह
    हो चला विश्वास मुझको ।
    प्रेम की इस अग्नि मैं अब ,
    पाप का परिहार कर लूँ ।

    shabdo men jaise dil dhadak raha ho..
    ho chala viswaaas mujhko ..
    wah ji wah
    dil se badhai sweekar karen

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